शायद उस दौर तक न्यूज़रूम में ताक़त का खेल शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि
उस दौरान संपादक और जूनियर्स के बीच बातचीत बेहद कम हुआ करती थी.
ये कहा जाता था कि अगर तुम्हारी संपादक से मुलाक़ात हो रही है तो या तो तुमको नौकरी दी जा रही है या नौकरी से निकाला जा रहा है.
आपके काम की तारीफ़ करने के लिए भी आपके काम को देखने वाले व्यक्ति के मार्फत की जाती थी. नौकरी के लिए लिखित परीक्षा होती थी और पैनल इंटरव्यू होता था.
जब भी संपादक न्यूज़रूम में आता था तो सभी लोगों के साथ मीटिंग होती थी. उस दौर में कभी दरवाज़ों के पीछे संपादक के साथ मीटिंग नहीं होती थी.
लेकिन 80 के दशक से चीज़ें बदलनी शुरू हुईं. संपादक और वरिष्ठ पत्रकार एक शख्सियत के साथ आने लगे.
लेकिन उनकी शरारतें उनके साथ काम करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं बीती थीं.
उस दौर के बाद से जितनी महिला पत्रकार सामने आई हैं, उनके व्यक्तिगत पहलुओं से हमारा कोई सरोकार नहीं है.
मैंने तीन ऐसे संपादकों के साथ काम किया है जो हमेशा महिलाओं के बीच होने वाली मसालेदार बातचीतों का विषय हुआ करते थे. लेकिन तीनों में से किसी ने मेरे साथ कभी कुछ ग़लत नहीं किया.
मेरे पास इसकी वजह है. शिकारी हमेशा एक आसान शिकार की तलाश में रहता है. उस दौर तक मेरी पीढ़ी की पत्रकारों ने अपने काम के जरिए एक ख़ास जगह बना ली थी और वरिष्ठता के क्रम में ऊपर पहुंच गई थीं.
ऐसे में हमारे साथ किसी तरह की कोशिश उनके लिए ख़तरनाक साबित हो सकती थी.
हम पलटवार करने में सक्षम थे और हम उन पदों पर मौजूद थे जिससे हमारी आवाज़ सुनी जाती.
हम अपने परिवार से दूर रहने वाली सेलिब्रिटी पत्रकारों के आभामंडल में क़ैद रहने वाली युवा इंटर्न की तरह आसान शिकार नहीं हुआ करते थे.
ऐसे में शिकारी पुरुषों ने युवा इंटर्नों की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया जो कि हमारी पीढ़ी की पत्रकारों में मौजूद नहीं थी.
लेकिन मेरे दिमाग़ में अभी भी एक सवाल है कि ऐसे प्रगतिशील बुद्धिजीवी भेड़ियों की गिरफ़्त में आने के बाद ये युवा महिलाएं हमारी जैसी वरिष्ठ महिला साथी पत्रकारों के पास क्यों नहीं आईं.
मैं पूरी तरह समझती हूं कि ऐसी घटनाओं से जुड़ना भी अपने आप में अवसाद से भरा अनुभव होता है और ये एक वजह हो सकती है. हालांकि, मेरे कई युवा मित्र भी हैं.
लेकिन मैं ये मानना चाहूंगी कि मैंने कहीं न कहीं उन्हें निराश किया है, क्योंकि मैं उनके अंदर ये भरोसा नहीं जता सकी कि मैं उनके लिए लड़ाई करूंगी और वह मुझे आकर अपना दर्द नहीं बता सकीं.
लेकिन मैं अब मीडिया में यौन शोषण करने वाले पुरुषों के नाम लेने वाली बहादुर लड़कियों को खुला समर्थन देकर अपनी इस ग़लती को सुधारने की उम्मीद करती हूं.
ये कहा जाता था कि अगर तुम्हारी संपादक से मुलाक़ात हो रही है तो या तो तुमको नौकरी दी जा रही है या नौकरी से निकाला जा रहा है.
आपके काम की तारीफ़ करने के लिए भी आपके काम को देखने वाले व्यक्ति के मार्फत की जाती थी. नौकरी के लिए लिखित परीक्षा होती थी और पैनल इंटरव्यू होता था.
जब भी संपादक न्यूज़रूम में आता था तो सभी लोगों के साथ मीटिंग होती थी. उस दौर में कभी दरवाज़ों के पीछे संपादक के साथ मीटिंग नहीं होती थी.
लेकिन 80 के दशक से चीज़ें बदलनी शुरू हुईं. संपादक और वरिष्ठ पत्रकार एक शख्सियत के साथ आने लगे.
लेकिन उनकी शरारतें उनके साथ काम करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं बीती थीं.
उस दौर के बाद से जितनी महिला पत्रकार सामने आई हैं, उनके व्यक्तिगत पहलुओं से हमारा कोई सरोकार नहीं है.
मैंने तीन ऐसे संपादकों के साथ काम किया है जो हमेशा महिलाओं के बीच होने वाली मसालेदार बातचीतों का विषय हुआ करते थे. लेकिन तीनों में से किसी ने मेरे साथ कभी कुछ ग़लत नहीं किया.
मेरे पास इसकी वजह है. शिकारी हमेशा एक आसान शिकार की तलाश में रहता है. उस दौर तक मेरी पीढ़ी की पत्रकारों ने अपने काम के जरिए एक ख़ास जगह बना ली थी और वरिष्ठता के क्रम में ऊपर पहुंच गई थीं.
ऐसे में हमारे साथ किसी तरह की कोशिश उनके लिए ख़तरनाक साबित हो सकती थी.
हम पलटवार करने में सक्षम थे और हम उन पदों पर मौजूद थे जिससे हमारी आवाज़ सुनी जाती.
हम अपने परिवार से दूर रहने वाली सेलिब्रिटी पत्रकारों के आभामंडल में क़ैद रहने वाली युवा इंटर्न की तरह आसान शिकार नहीं हुआ करते थे.
ऐसे में शिकारी पुरुषों ने युवा इंटर्नों की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया जो कि हमारी पीढ़ी की पत्रकारों में मौजूद नहीं थी.
लेकिन मेरे दिमाग़ में अभी भी एक सवाल है कि ऐसे प्रगतिशील बुद्धिजीवी भेड़ियों की गिरफ़्त में आने के बाद ये युवा महिलाएं हमारी जैसी वरिष्ठ महिला साथी पत्रकारों के पास क्यों नहीं आईं.
मैं पूरी तरह समझती हूं कि ऐसी घटनाओं से जुड़ना भी अपने आप में अवसाद से भरा अनुभव होता है और ये एक वजह हो सकती है. हालांकि, मेरे कई युवा मित्र भी हैं.
लेकिन मैं ये मानना चाहूंगी कि मैंने कहीं न कहीं उन्हें निराश किया है, क्योंकि मैं उनके अंदर ये भरोसा नहीं जता सकी कि मैं उनके लिए लड़ाई करूंगी और वह मुझे आकर अपना दर्द नहीं बता सकीं.
लेकिन मैं अब मीडिया में यौन शोषण करने वाले पुरुषों के नाम लेने वाली बहादुर लड़कियों को खुला समर्थन देकर अपनी इस ग़लती को सुधारने की उम्मीद करती हूं.
No comments:
Post a Comment